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• पंक्तियाँ: बदला-बदला .... टुकुर टुकुर
• संदर्भ: गाँव-शहर नवगीत में कवि प्रदीप शुक्ल जी ने गाँव और शहर के दर्द को दर्शाया है।
• भावार्थ: कवि कहते हैं, की आज हर तरफ परिस्थिति हो लहर चल रही है। आज जिधर देखो, बदलाव नजर आता है। मौसम बदला-बदला-सा लगता है। इस बदलाव को शहर अचरज से देख रहा है। और शहर गाँव टकटकी लगाकर देखता है
।
• पंक्तियाँ: तिल रखने .... झरे हुए।
• भावार्थ: कवि कहते हैं, की गाँवो से लोग रोजगार और काम की तलाश में रोज शहरो की ओर आ रहा रहे हैं। शहर ठसाठस भरे हुए हैं। वहाँ तिल रखने की भी जगह नहीं है। दूसरी ओर लोगो के पलायन से गांव खाली हो गए हैं।
• पंक्तियाँ: मेट्रो .... टुकुर टुकुर।
• भावार्थ: कवि कहते हैं, की गाँवो से लोग शहर आते तो रहे हैं पर उनके पास रहने की जगह नहीं है। बरस [परमेसुर] जैसे कोई मेट्रो के खंभे के नीचे, तो कोई सड़क के किनारे रात गुजारता है। इसलिए गाँव और शहर इस परिवर्तन से आश्चर्यचकित हैं।
• पंक्तियाँ: इधर शहर .... धुकुर-पुकुर
• भावार्थ: कवि कहते हैं, की दूसरी ओर शहरों में यह आलम है की आँखें खुलते ही लोगो को काम के लिए भागभाग शुरू हो जाती है। रेडियो स्टेशन पर रामदीन समाचारो की राह देख रहा है। उसे बड़ी घबराहट हो रही है की कहीं बाहर से आनेवाले लोगों के लिए कोई बुरी खबर तो नहीं है।
• पंक्तियाँ: सुरसतिया के .... न हमाने
• भावार्थ: कवि कहते हैं, की सुरसतिया के दोनों बेटे की तरह गाँव के अनेक युवक काम की तलाश में सूरत जैसे शहरो में जाते हैं। गाँवो में खेती की देखभाल करनेवाला कोई नहीं है। जिन जमीनों में सोने जैसे गेहूँ उगता है वे खाली पड़ी है। उन खेतों में गिल्ली गिलहरी खेल रही है के ग्रीष्म में धूप में सेकती है।
फ्लैशकार्ड 6
• पंक्तियाँ: लँगड़ाकर .... टुकुर-टुकुर।
• भावार्थ: कवि कहते हैं की, गाँवों में पक्की स्मार्ट सड़के बन रही हैं। उन सड़को पर चलने के कारण गायो के खुर खराब हो गए हैं। गाय अब लँगड़ा कर चलती हैं। इस बदलाव को शहर अचरज से देखता और गाँव टकटकी लगाकर देखता है।