Hindi unit 2


1. पृष्ठभूमि

हिंदी भारत की प्रमुख आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में से एक है। हिंदी आज जिस रूप में दिखाई देती है, वह एक लंबे समय के भाषाई और ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। हिंदी एकदम से नहीं बनी, बल्कि कई चरणों से गुजरकर आज की आधुनिक मानक हिंदी बनी।


》 हिंदी के विकास को सामान्य रूप से इस प्रकार समझ सकते हैं—


संस्कृत → पालि/प्राकृत → अपभ्रंश → अवहट्ट → पुरानी हिंदी → आधुनिक हिंदी → मानक हिंदी


● संस्कृत में प्रयोग होने वाले कठिन शब्द जब आम लोगों की बोलचाल में सरल होने लगे, तो उनसे प्राकृत भाषाओं का विकास हुआ। आगे चलकर प्राकृत से अपभ्रंश भाषाएँ बनीं। अपभ्रंश के अंतिम चरण को अवहट्ट कहा गया। इस अवस्था में आधुनिक भारतीय भाषाओं के शुरुआती रूप दिखाई देने लगे।


●हिंदी के विकास में केवल भाषा ही कारण नहीं थी। सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिस्थितियों का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा।


●उदाहरण के लिए, संस्कृत का ‘कृष्ण’ शब्द लोकभाषा में कई ध्वनि-परिवर्तनों से गुजरकर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। इसी तरह संस्कृत के ‘कर्ण’ शब्द में भी प्राकृत और अपभ्रंश की परंपरा में ध्वनि परिवर्तन दिखाई देते हैं।


☆ इससे पता चलता है कि भाषा का विकास धीरे-धीरे होने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया है।


2. अपभ्रंश

‘अपभ्रंश’ का सरल अर्थ है—मूल रूप से बदला हुआ या अलग रूप।


शुरुआत में संस्कृत के विद्वान लोकभाषा के उन रूपों को अपभ्रंश कहते थे जो संस्कृत के निश्चित व्याकरणिक नियमों से अलग थे। बाद में अपभ्रंश स्वयं एक विकसित साहित्यिक भाषा बन गया।


लगभग 6वीं से 12वीं शताब्दी के बीच अपभ्रंश का महत्वपूर्ण विकास हुआ। जैन आचार्यों और कवियों ने अपभ्रंश में बहुत-सा साहित्य लिखा।


स्वयंभू, पुष्पदंत और धनपाल जैसे रचनाकारों का अपभ्रंश साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।


अपभ्रंश में शब्दों और ध्वनियों को सरल बनाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, संस्कृत के कठिन संयुक्त व्यंजन धीरे-धीरे सरल होने लगे। इसी तरह शब्दों के अंत में आने वाले विभक्ति-चिह्न भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगे।


इन बदलावों ने आगे चलकर आधुनिक भारतीय भाषाओं की भाषा-रचना को बनाने में मदद की।

● उदाहरण:

संस्कृत ‘कार्य’ → प्राकृत/अपभ्रंश में ध्वनि परिवर्तन → आधुनिक हिंदी में ‘काज/काम’


इस उदाहरण से पता चलता है कि शब्द समय के साथ अपना रूप बदलते हैं।


इस प्रकार अपभ्रंश को हिंदी सहित कई आधुनिक उत्तर भारतीय भाषाओं के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।


3. अवहट्ट

अपभ्रंश के अंतिम विकसित चरण को सामान्यतः ‘अवहट्ट’ कहा जाता है।


अवहट्ट वह बीच की भाषा-अवस्था थी जिसमें अपभ्रंश की विशेषताएँ धीरे-धीरे कम होने लगीं और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के शुरुआती रूप दिखाई देने लगे।


अवहट्ट की भाषा पहले की तुलना में सरल और बोलचाल के अधिक करीब थी।


इसमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया और वाक्य बनाने के ऐसे रूप मिलने लगे जो आगे चलकर हिंदी, बंगला, असमिया, मैथिली, राजस्थानी आदि भाषाओं में दिखाई देते हैं।


इस समय की भाषा में लोकजीवन, धार्मिक विचारों और सामाजिक अनुभवों को विशेष रूप से व्यक्त किया गया।


विद्यापति की रचनाओं में इस समय के भाषा-रूपों का प्रभाव दिखाई देता है। इसी प्रकार सिद्धों और नाथपंथी कवियों की रचनाओं में भी ऐसी भाषा मिलती है जो अपभ्रंश और शुरुआती हिंदी के बीच की कड़ी मानी जाती है।


इसलिए अवहट्ट को हिंदी के विकास की एक संक्रमणकालीन अवस्था कहा जाता है।


सरल शब्दों में:
अपभ्रंश से आधुनिक भाषाओं की ओर जाने के बीच की भाषा-अवस्था = अवहट्ट


4. पुरानी हिंदी

लगभग 10वीं–11वीं शताब्दी के बाद हिंदी के शुरुआती रूप अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगे। इस समय को सामान्यतः पुरानी हिंदी या प्रारंभिक हिंदी के विकास का समय माना जाता है।


इस समय हिंदी कोई एक निश्चित और मानक भाषा नहीं थी। इसके बजाय यह अलग-अलग क्षेत्रीय बोलियों और भाषाई रूपों में विकसित हो रही थी।


पुरानी हिंदी के विकास में ब्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, बुंदेली, भोजपुरी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषिक रूपों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।


प्रारंभिक हिंदी साहित्य में वीरगाथा से जुड़ी रचनाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।


चंदबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’ को हिंदी के प्रारंभिक साहित्य से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसके वर्तमान पाठ और भाषा को लेकर विद्वानों में मतभेद भी हैं।


बाद में कबीर, सूरदास, तुलसीदास और जायसी जैसे कवियों ने हिंदी की अलग-अलग लोकभाषाओं और बोलियों को साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान दिया।

उदाहरण:

  • तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ मुख्य रूप से अवधी में है।

  • सूरदास की ‘सूरसागर’ में मुख्य रूप से ब्रजभाषा का प्रयोग मिलता है।


इस प्रकार पुरानी हिंदी के विकास ने हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य दोनों के लिए मजबूत आधार तैयार किया।


5. मानक हिंदी

आधुनिक समय में हिंदी के कई क्षेत्रीय रूपों में से खड़ी बोली के आधार पर आधुनिक मानक हिंदी का विकास हुआ।


19वीं शताब्दी में मुद्रण, शिक्षा, पत्रकारिता, प्रशासन और राष्ट्रीय आंदोलन के बढ़ने के साथ खड़ी बोली हिंदी का महत्व तेजी से बढ़ा।

◇ भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक हिंदी गद्य और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

◇ महावीर प्रसाद द्विवेदी

इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय हिंदी भाषा में व्याकरण के नियमों, भाषा की शुद्धता और व्यवस्थित गद्य लेखन को अधिक महत्व दिया गया।

◇ अन्य साहित्यकार

◇ बाद में प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त और रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने मानक हिंदी के विकास और उसके प्रसार को और मजबूत किया।


》मानक हिंदी का मुख्य आधार:


  • देवनागरी लिपि

  • खड़ी बोली


है।


मानक हिंदी का प्रयोग शिक्षा, प्रशासन, साहित्य, पत्रकारिता, संचार और अन्य औपचारिक क्षेत्रों में किया जाता है।

》 उदाहरण:

“भारत एक विविधतापूर्ण देश है।”


यह आधुनिक मानक हिंदी के सामान्य व्याकरण और शब्दावली का उदाहरण है।


निष्कर्ष

हिंदी का वर्तमान रूप कई शताब्दियों के भाषाई परिवर्तन, साहित्यिक परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का परिणाम है।


हिंदी की विकास-यात्रा को इस प्रकार याद किया जा सकता है—


संस्कृत → पालि/प्राकृत → अपभ्रंश → अवहट्ट → पुरानी हिंदी → आधुनिक हिंदी → मानक हिंदी


हिंदी का विकास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। आज भी हिंदी नई तकनीक, मीडिया, विज्ञान और वैश्विक संचार के प्रभाव से नए शब्दों और नए अभिव्यक्ति-रूपों को अपना रही है।


इसलिए हिंदी का विकास अतीत से वर्तमान तक और वर्तमान से भविष्य की ओर लगातार जारी रहने वाली प्रक्रिया है।