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हम पंछी उन्मुक्त गगन के यह कविता शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा लिखी गई है , इस कविता में कवि पक्षियों की आज़ादी की बात कर रहे है |

कविता में कवि पक्षियों की भावनाओं को बता रहे है , पक्षी अपनी वाणी के माध्यम से वो अपने भाव को प्रकट करते है | अगर हम हम उन्हें पिंजरे में बंद कर देंगे तो वो अपना स्वाभिक खो देंगे , चहकना भूल जाएगे , उड़ना भूल जाएगे | पिंजरे में बंद होने से अच्छा हम बहार नुम के कड़वे पत्ते खाना पसंद करते है |

        पक्षियों की इच्छा खुले आसमान में उड़ने की है | नदी-झरनों का बहता जल पीना चाहते हैं। वह आकाश को छूना चाहते है | अपनी इच्छा से ऊँची-से-ऊँची उड़ान भरना चाहते है , पेड़ों पर घोंसले बनाकर रहना चाहते है, नदी-झरनों का जल पीना, फल-फूल खाना चाहते है| पक्षियों की पंखो की आज़ादी को कैद नहीं करना चाहिए |

पक्षियों को हमें बंदी नहीं बनाना चाहिए उन्हें आज़ादी में घुमने देना चाहिए |पक्षियों की पंखो की आज़ादी को कैद नहीं करना चाहिए |

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यह पाठ लेखक नागार्जुन ने लिखा है जिसमें उन्होंने हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों के बारे में बताया है| हिमालय से बहने वाली गंगा, यमुना, सतलुज आदि नदियाँ दूर से लेखक को शांत, गंभीर दिखाई देती थीं| लेखक के मन में इनके प्रति श्रद्धा के भाव थे। जब लेखक ने जब इन नदियों को हिमालय के कंधे पर चढ़कर देखा तो उन्हें लगा की ये तो काफी पतली हैं जो समतल मैदानों में विशाल दिखाई देती थीं। 

लेखक को हिमालय की इन बेटियों की बाल-लीलाओं को देखकर आश्चर्य होता है। हिमालय की इन बेटियों का न जाने कौन-सा लक्ष्य है, जो इस प्रकार से बेचैन होकर बह रही हैं। नदियाँ बर्फ की पहाड़ियों में, घाटियों में और चोटियों पर लीलाएँ करती हैं। लेखक को लगता है देवदार, चीड़, सरसों, चिनार आदि के जंगलों में पहुँचकर शायद इन नदियों को अपनी बीती बातें याद आ जाती होंगी। 




सिंधु और ब्रह्मपुत्र दो महानदियाँ हिमालय से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं। हिमालय को ससुर और समुद्र को उसका दामाद कहने में भी लेखक को कोई झिझक नहीं होती। कालिदास के यक्ष ने अपने मेघदूत से कहा था कि बेतवा नदी को प्रेम का विनिमय देते जाना जिससे पता चलता है कि कालिदास जैसे महान कवि को भी नदियों का सजीव रूप पसंद था। 

काका कालेलकर ने भी नदियों को लोकमाता कहा है। लेकिन लेखक इन्हें माता से पहले बेटियों के रूप में देखते हैं। कई कवियों ने इन्हें बहनों के रूप में भी देखा है| लेखक तिब्बत में सतलुज के किनारे पैर लटकाकर बैठने से वे इससे काफी प्रभावित हो गए।

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कठपुतली वसंत भाग - 1 (Summary of Kathputli Vasant)

यह कविता भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा लिखा गया है जिसमें कवि ने हमें अपनी स्वतंत्रता के लिए सचेत रहने को कहा है| कठपुतली जो दूसरों के इशारे पर नाचती है, एक दिन गुलामी से तंग आकर बोली - ये धागे मेरे शरीर के आगे और पीछे क्यों बाँध रखे हैं? तुम इन्हें तोड़ कर मुझे स्वतंत्र कर दो ताकि मैं अपने पैरों पर खुद चल सकूँ।

एक कठपुतली के स्वतंत्र होने की इच्छा को सुनकर अन्य कठपुतलियाँ भी कहने लगीं कि हमने बहुत दिनों से अपने मन की बात नहीं की। हमने अपने मन की इच्छाओं को दबा रखा है।

अन्य कठपुतलियों के स्वतंत्र होने की इच्छा देखकर पहली कठपुतली सोचने लगती है कि इस इच्छा का क्या परिणाम होगा? क्या वे अपनी स्वतंत्रता को सँभाल पाएँगीं? अपने पैरों पर खड़ी रह पाएँगीं ? अन्य कठपुतलियाँ आज़ादी का सही उपयोग कर सकेंगी? फलस्वरूप पहली कठपुतली सोच-समझ कर कोई कदम उठाना जरूरी समझती हैं।


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मिठाईवाला वसंत भाग - 1 (Summary of Mithaiwala Vasant)

यह कहानी भगवतीप्रसाद वाजपेयी जिसमें कहानीकार ने एक पिता का बच्चों के प्रति प्रेमभाव को दर्शाया है| किस तरह से एक पिता अपने बच्चों को खोने के बाद अन्य बच्चों में उस ख़ुशी की तलाश करता है|

एक आदमी पहले एक खिलौनेवाले के रूप में आता है। वह मधुर स्वर में बच्चों को बहलाने वाला, खिलौनेवाला' गाकर सुनाता है। सभी बच्चे उसके खिलौनों पर रीझकर अपनी तोतली आवाज़ में भाव पूछते हैं। नन्हे-नन्हे बच्चों से पैसे लेकर तथा उन्हें खिलौने दे वह फिर वहाँ से गीत गाता हुआ चल पड़ता है| राम विजय बहादुर के बच्चे चुन्नू-मुन्नू भी एक दिन खिलौने लेकर आए। उनकी माँ रोहिणी इतने सुंदर और सस्ते खिलौने देखकर सोचने लगी कि वह इतने सस्ते खिलौने कैसे दे कर गया। 


इसके छह महीने बाद नगर में किसी मधुर मुरली बजाकर बेचने वाले का समाचार शहर फैल गया। वह बहुत सस्ती मुरली बेचता था। रोहिणी उसकी आवाज़ सुनकर पहचान गयी ये वही खिलौनेवाला है| रोहिणी ने अपने पति के द्वारा इस मुरलीवाले को बुलाया तथा अपने बच्चों के लिए मुरली खरीद ली। फिर उसे देख बच्चों का समूह खुश होकर उसके चारों तरफ़ इकट्ठा हो गए। मुरली वाले ने सभी बच्चों को देने के बाद उस बच्चे को भी मुफ्त में मुरली दी जिसके पास पैसे भी नहीं थे।

इसके आठ मास बाद सर्दियों में एक मिठाई बेचने वाला गीत गाता हुआ आया। रोहिणी को इसका स्वर भी कुछ सुना हुआ-सा लगा। वह अपनी छत से तुरंत नीचे आई। उसने मिठाईवाले को बुलाया। रोहिणी के पूछने पर उसने बताया कि वह इससे पहले खिलौने और मुरली बेचने आया था। रोहिणी ने उससे पूछा कि वह इतनी सस्ती चीज़ें क्यों बेचता है| मिठाईवाले ने बताया कि वह एक नगर का अमीर आदमी था। उसके दो बच्चे और एक सुंदर पत्नी थी लेकिन अब कुछ भी नहीं रहा। वह अपनी पुरानी बातें याद करके फूट-फूटकर रोने लगा। उसने बताया कि वह इन्हीं बच्चों में अपने बच्चों की झलक देखने के लिए यह सामान बेचता फिरता है। वह रोहिणी के बच्चों चुन्नू-मुन्नू को कागज़ की पुड़िया में मिठाई बिना पैसे लिए ही देकर गीत गाता चल दिया।