कुछ विद्वान 'हिन' (नष्ट करना) + 'दु' (दुष्ट) = दुष्टों को नष्ट करने वाला मानते हैं।
कुछ 'हीन' + 'दु' = हीनों (मलेच्छों) का दलन करने वाला मानते हैं।
ईरानियों ने सिंधु नदी के आसपास के क्षेत्रों को हिन्दू कहा।
धीरे-धीरे 'हिन्दू' शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया।
'हिन्द' में 'इक' प्रत्यय के योग से 'हिन्दीक' बना, जिसका अर्थ है 'हिन्द का'।
'हिन्दीक' का 'क' लोप होने से हिन्दी बना।
भाषा के अर्थ में हिन्दी शब्द का प्रारम्भिक प्रयोग फारस और अरब में छठवीं शताब्दी में मिलता है।
भारत में इस शब्द का प्रयोग मुसलमानों द्वारा किया गया था।
मुसलमानों ने मध्य देश की भाषा को 'जबाने हिंदी' या 'हिंदी ज़बान' कहा।
प्रारंभ में इसका प्रयोग मुसलमानों की हिंदवी के लिए हुआ।
1800 के बाद अंग्रेजों ने इसे देवनागरी लिपि वाली संस्कृत की ओर झुकी भाषा के रूप में प्रचारित किया।
हर काल में एक मानक भाषा और दूसरी लोक भाषा रही हैं।
मानक भाषा सभ्य समाज द्वारा उपयोग की जाती है, जिसका व्याकरण निर्धारित होता है।
लोक भाषा सामान्य बोलचाल की भाषा होती है।
संस्कृत में वैदिक और लौकिक परम्पराएं थी।
वैदिक परम्परा की भाषा को देव भाषा कहा जाता था।
प्राकृत भाषा आम लोगों के लिए उभरी।
संस्कृत नाटकों में आम लोगों की भाषा प्राकृत थी।
प्राकृत और पालि भाषा का जन्म हुआ, जिन्होंने जन की भाषिक अभिव्यक्ति को अपनाया।
प्राकृत और अपभ्रंश से अन्य भाषाएँ विकसित हुईं (500-1000 ईस्वी)।
अपभ्रंश का विकास पश्चिमी और पूर्वी रूपों में हुआ।
7वीं शताब्दी के आसपास अपभ्रंश की साहित्यिक रचनाओं से आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास हुआ।
1150 ईस्वी के बाद साहित्यिक रचनाओं का कार्य शुरू हो पाया।
संस्कृत का काल मोटे तौर पर 1500 ई. पू. से 500 ई. पू. तक माना जाता है।
वैदिक संस्कृत - वैदिक वाङ्मय
लौकिक संस्कृत - बाल्मीकि, व्यास, भाष, अश्वघोष और कालिदास आदि की रचनाएँ।
500 ई. पू. से पहली ई. तक की भाषा पालि कहलायी।
1 ई. पू. से 500 ई. तक भाषा प्राकृत कहलायी।
500 ई. से 1000 ई. तक की भाषा अपभ्रंश कहलायी।
अपभ्रंश और आधुनिक भाषाएँ
शौरसेनी: पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती
पैसाची: लहंदा, पंजाबी
ब्राचड: सिन्धी
महाराष्ट्री: मराठी
मागधी: बिहारी, बांगला, उडिया, असमिया
अर्धमागधी: पूर्वी हिन्दी
हिन्दी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी तथा मागधी रूपों से हुआ है।
हिन्दी की उपभाषाएँ और बोलियाँ
शौरसेनी:
पश्चिमी हिन्दी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणी, बुंदेली, कन्नौजी
अर्धमागधी:
पूर्वी हिन्दी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
शौरसेनी:
राजस्थानी: पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी), पूर्वी राजस्थानी (जयपुरी), उत्तरी राजस्थानी (मेवाती), दक्षिणी राजस्थानी (मालवी)
शौरसेनी:
पहाड़ी: पश्चिमी पहाड़ी, मध्यवर्ती पहाड़ी (कुमाउंनी-गढ़वाली)
मागधी:
बिहारी: भोजपुरी, मगही, मैथिली
हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ का सामान्य परिचय
पश्चिमी हिन्दी: शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित; कौरवी, ब्रज, हरियाणी, बुन्देली, कन्नौजी
पूर्वी हिन्दी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
पश्चिमी हिन्दी
'पश्चिमी हिन्दी' उपभाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
पश्चिमी हिन्दी उपभाषा के अन्तर्गत कौरवी, ब्रज, हरियाणी, बुन्देली और कन्नौजी बोलियों की गणना की जाती है।
'दक्खिनी' पश्चिमी हिन्दी उपभाषा की वह बोली है, जो पश्चिमी क्षेत्र से बाहर मुम्बई, चेन्नई और हैदराबाद के आसपास बोली जाती है।
हरियाणी, कौरवी और दक्खिनी बोलियाँ ओकार बहुला है।
ब्रज, बुन्देली और कन्नौजी ओकार बहुला बोलियाँ है।
हरियाणी, कौरवी और दक्खिनी बोलियों पर 'पंजाबी' का प्रभाव अधिक है।
बुन्देली और कन्नौजी 'ब्रजभाषा' की ही उपबोलियाँ है।
'पूर्वी हिन्दी' उपभाषा के अन्तर्गत अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी बोलियाँ आती है।
बुन्देली उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश की सीमा के झाँसी, जालौन, हमीरपुर, बाँदा, छतरपुर, सागर, ग्वालियर, भोपाल, ओरछा, नरसिंहपुर, सिवनी, होशंगाबाद तथा उसके निकटवर्ती भूभाग को बुन्देलखण्ड कहते हैं तथा इसकी बोली को बुन्देलखण्डी या बुन्देली कहते है।
बुन्देला राजपूतों के आधिपत्य के कारण इस क्षेत्र का नाम बुन्देलखण्ड पड़ा।
'लालकवि' ने छत्रसाल बुन्देला की आज्ञा से 'बुन्देली' में 'छत्रप्रकाश' नामक ग्रन्थ की रचना की।
पद्माकर और केशवदास का सम्बन्ध बुन्देलखण्ड से रहा है, परन्तु उनके ग्रन्थों की भाषा बुन्देली प्रभावित 'ब्रज' ही रही।
ब्रज
ब्रज भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
इसका एक नाम अन्तर्वेदी भी है। कुछ लोग इसे माथुरी या नागभाषा भी कहते हैं।
ब्रज शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में चारागाह के लिए किया गया है।
ब्रज शब्द का प्राचीनतम प्रयोग गोपाल कृत रस विलास टीका में मिलता है।
क्षेत्र: मथुरा, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, बदायूँ, बरेली, गुड़गांव जिले के पूर्वी, राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, ग्वालियर
ब्रज भाषा की उपबोलियाँ: भरतपुरी, डांगी, माथुरी, कठेरिया, गाँववारी, जादोवारी, ढोल पूरी,तथा सिकरवाड़ी।
साहित्यिक दृष्टि से ब्रजभाषा अन्य बोलियों की तुलना में अधिक समृद्ध है।
शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली को जाटू, देसवाली भी कहा जाता है।
ग्रियर्सन ने इसे बांगरू कहा है। बांगर का अर्थ होता है उच्चभूमि।
यमुना के बांगर क्षेत्र की बोली होने के कारण यह बांगरू है।
मुख्य क्षेत्र: करनाल, रोहतक, पानीपत, कुरुक्षेत्र, जिंद, हिसार।
उपबोलियाँ: केंद्रीय हरियाणवी बांगरू, अहीरवाटी, केंद्रीय हरियाणा।
हरियाणवी साहित्य में रचनाएं तो बहुत अधिक देखने को नहीं मिलती है लेकिन लोक साहित्य में पर्याप्त मात्रा में रचनाएं हुई हैं।
गरीबदास यहां के प्रमुख कवि हैं, लख्मीचंद एक प्रसिद्ध लोक कवि हैं।
कन्नौजी
कन्नौजी शब्द संस्कृत ‘कान्यकुब्ज' से विकसित है: कान्यकुब्ज- कण्णउज्ज- कन्नौज।
कन्नौजी जनपद का पुराना नाम पांचाल था।
कन्नौजी बोली का केन्द्र कन्नौज है।
कन्नौजी ब्रजभाषा के इतनी अधिक समान है कि इसे ब्रजभाषा की ही एक उपबोली माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, हरदोई, कन्नौज, फुर्रुखाबाद, कानपुर, इटावा और पीलीभीत में कन्नौजी बोली जाती है।
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने कन्नौजी को ब्रजभाषा का ही एक उपरूप माना है।
कन्नौजी में स्वयमध्य 'ह' के लोप की प्रवृत्ति पाई जाती है, जैसे: करहु- करउ, कहिहौं-कहडौं आदि।
ब्रज के अन्तिम 'यो' तथा 'वो' के स्थान पर कन्नौजी में अधिकांश स्थलों पर 'ओ' मिलता है: जैसे- गयो-गओ, भयो - भओ, खायो - खाओ आदि।
कन्नौजी में 'वा' तथा 'इया' प्रत्ययों का प्रयोग बहुत होता है: बच्चा-बच्चवा या बचवा, लका-लरिकवा, बाप-बपुआ, छोकरी- छोकरिया आदि।
खड़ी बोली
खड़ी से 'खरी' का अर्थ भी लगाया जाता है अर्थात् शुद्ध अथवा ठेठ हिन्दी बोली।
18वीं शताब्दी के आरम्भ में हिंदी गद्यकारों ने ठेठ हिंदी में लिखना शुरू किया।
इसे 'खरी हिंदी' या 'खड़ी हिंदी' कहा गया।
कुछ लोग खड़ी मात्राओं की अधिकता के कारण इसे खड़ी बोली मानते हैं।
कुछ ब्रजभाषा की तुलना में अधिक कर्कश होने के कारण इसे खरी बोली कहते हैं।
एक धारणा है कि यह मेरठ के आसपास की पड़ी बोली को खड़ी बना कर लश्करों में प्रयोग किया गया।
कुछ इसके बोलने में खरापन होने के कारण इसे खड़ी बोली कहते है। वैसे तो खड़ी बोली का मानक रूप 19वी शताब्दी में विकसित माना जाता है।
अमीर खुसरो की पहेलियों में खड़ी बोली का प्रथम साहित्यिक प्रयोग दिखता है।
खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य अयोध्या सिंह उपाध्याय द्वारा लिखित प्रियप्रवास है।
क्षेत्र: मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून के मैदानी भाग, अम्बाला, कलसिया और पटियाला के पूर्वी भाग, रामपुर और मुरादाबाद।
खड़ी बोली क्षेत्र के पूर्व में ब्रजभाषा, दक्षिण-पूर्व में मेवाती, दक्षिण-पश्चिम में पश्चिमी राजस्थानी। मेरठ की खड़ी बोली आदर्श खडी बोली मानी जाती है जिससे आधुनिक हिंदी भाषा का जन्म हुआ।
पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ
अवधी
अवधी अर्थात अवध क्षेत्र में बोले जाने वाली बोली।
अवधी का केंद्र अयोध्या है।
अवधी को कोसली, पूर्वी, उत्तराखंडी, बैसबाडी भी कहा जाता है।
अधिकांश विद्वान अवधी नाम के पक्ष में हैं।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी गोंडा, बहराइच,लखनऊ, उन्नाव, बस्ती, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई का कुछ भाग फैजाबाद सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, बाराबंकी, फतेहपुर,इलाहाबाद, मिर्जापुर का कुछ भाग तथा जौनपुर के कुछ भाग में बोली जाती है।
बिहार के मुसलमान भी अवधी बोलते हैं।
यह मिश्रित अवधी मुजफ्फरपुर तक बोली जाती हैं अवधी की उपबोलियों की संख्या 13 बताई जाती हैं।
अवधी नागरी लिपि और फारसी लिपि में लिखी जाती है।
जायसी, मंझन, उस्मान, तुलसीदास, सूरजदास, ईश्वरदास छेमकरन, कासिम शाह इत्यादि अवधि के प्रमुख कवि हैं। रामचरितमानस अवधी में है।
बघेली
डॉ. बाबूराम सक्सेना ने 'बघेली' को 'अवधी' की ही उपबोली माना है।
'बघेली' का उद्भव अर्धमागधी अपभ्रंश के ही एक क्षेत्रीय रूप से हुआ है।
रीवा तथा आसपास का क्षेत्र बघेल राजपूतों के वर्चस्व के कारण बघेलखण्ड कहलाया और वहाँ की बोली 'बघेलखंडी' या 'बघेली' कहलाई।
छत्तीसगढ़ी
छत्तीसगढ़ी भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में बोली जाने वाली एक अत्यन्त ही मधुर व सरस भाषा है।
यह हिन्दी के अत्यन्त निकट है और इसकी लिपि देवनागरी है।
छत्तीसगढ़ी का अपना समृद्ध साहित्य व व्याकरण है।
यह पूर्वी हिन्दी की प्रमुख बोली है और छत्तीसगढ़ राज्य की प्रमुख भाषा है।
राज्य की 82.56 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है।
यह छत्तीसगढ़ी राज्य की संपर्क भाषा है।
राजस्थानी हिंदी की बोलियाँ
मारवाडी, मेवाती, मेवाडी हाडौती, जयपुर (शेखावटी)।
हिन्दी साहित्य के आदिकाल का अधिकतम साहित्य राजस्थान से प्राप्त हुआ है।
डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने 'भोली' को राजस्थानी उपभाषा की बोली माना है।
राजस्थानी हिन्दी की बोलियों में सर्वाधिक साहित्य 'मारवी' में लिखा गया है।
जयपुरी को 'ढूँढ़ाणी' भी कहते है।
मारवाड़ी हिंदी
पश्चिमी राजस्थानी (मारवाडी) बोली का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश के नागर रूप से हुआ है।
राजस्थान के जोधपुर, अजमेर, मेवाड़, सिरोही, बीकानेर, जैसलमेर, उदयपुर, चुरू, नागौर, पाली, जालौरा, बाडमेर जिलों में और पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के पूर्वी भाग में बोली जाती है।
लोक साहित्य की दृष्टि से 'मारवाडी' सम्पन्न उपभाषा है।
मेवाडी, सिरोही, बागीड थली, शेखावटी आदि ‘मारवाडी' की प्रमुख उपबोलियाँ है।
मीराबाई के पद कहीं 'मारवाडी' और कहीं 'ब्रजभाषा' में है।
पुरानी मारवाडी को ही 'डिंगल' कहा गया है।
जयपुरी
यह राजस्थान के पूर्वी भाग की बोली है।
इसका केन्द्र जयपुर है और जयपुर का पुराना नाम ‘ढूँढ़ाण' है, इसलिए इस बोली को 'ढूँढ़ाणी' भी कहते हैं।
‘जयुपरी' बोली का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से हुआ है।
जयपुरी की मुख्य उपबोलियाँ हैं- तोरावटी, काठँडा, चौरासी, अजमेरी और हाडौती।
'हाडौती' कोटा, बूँदी, बारन और झालावाड में बोली जाती है।
मेवाती
मेवाती राजस्थानी के उत्तर-पूर्व की बोली है।
इस पर ब्रजभाषा का प्रभाव है।
मेवाती का क्षेत्र अलवर, गुडगाँव, भरतपुर तथा आस-पास है।
इसकी एक मिश्रित उपबोली 'अहीरवाटी' है, जो गुडगाँव, दिल्ली, करनाल के पश्चिमी क्षेत्रों में बोली जाती है।
इस पर हरियाणी का प्रभाव है।
मेवाती की अन्य उपबोलियाँ राठी, नहेर, कठर, गुजरी आदि है।
मालवी
मालवी दक्षिणी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोली है।
उज्जैन के आसपास का क्षेत्र 'मालव' या 'मालवा' नाम से प्रसिद्ध रहा है।
यह उज्जैन, इन्दौर, देवास, रतलाम भोपाल, होशंगाबाद, परताबगढ़, गुना, नीमच, टोंक तथा आस-पास के क्षेत्र में व्यवहृत होती है।
मालवी बुन्देली और मारवाडी के बीच की स्थिति में है।
मालवी की मुख्य उपबोलियाँ- सोंडवाडी, राँगडी, पाटबी, रतलामी आदि है।
पहाड़ी हिंदी की बोलियाँ
पहाड़ी हिन्दी' के तीन उपरूप हैं- पश्चिमी, पूर्वी और मध्य
पश्चिमी पहाड़ी के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश की अनेक बोलियों की गणना की जाती है।
पूर्वी पहाड़ी ही 'नेपाली' है, जिसे भारतीय संविधान की अष्टम् सूची में स्थान प्राप्त है।
मध्य पहाड़ी की दो उपभाषाएँ हैं- 'कुमाउँनी' और 'गढ़वाली'।
कुमाउँनी
नैनीताल, अल्मोडा एवं पिथौरागढ़ क्षेत्र का परम्परागत नाम कूर्माचल है, जिसे अब ‘कुमाऊँ' कहते हैं।
कुमाउँनी पर दरद, खस, राजस्थानी, खड़ी बोली हिन्दी आदि के अतिरिक्त 'किरात', 'भोट आदि तिब्बत-चीनी परिवार की भाषाओं का प्रभाव रहा है।
कुमाउँनी में प्राचीन साहित्य तो नहीं परन्तु आधुनिक काल में साहित्य सर्जन हो रहा है।
लोक साहित्य की दृष्टि से कुमाउँनी सम्पन्न बोली है।
कुमाउँनी की दस से अधिक उपबोलियाँ हैं जैसे- खसपरजिया, कुमैयाँ, फल्दकोटिया, पछाई, चौगरखिया, गंगोला, दानपुरिया, सीराली, सोरियाली, अस्कोटी, जोहारी, रउचो भैंसी तथा भोटिया।
गढ़वाली
कुमाऊँ के पश्चिमी छोर से यमुना तक का भूभाग 'केदारखण्ड' कहलाता है।
मध्यकाल में यहाँ पवार राजपूतों और पाल वंश के राजाओं का शासन था।
बावन गढ़ियों में बँटे होने के कारण इस क्षेत्र को 'गढ़वाल' कहा गया।
गढ़वाल की बोली ‘गढ़वाली' है।
उत्तराखण्ड राज्य के टिहरी गढ़वाल की बोली गढ़वाली का आदर्श रूप मानी जाती है।
गढ़वाली में भोटिया, शक किरात, नागा और खस जातियों की भाषाओं के अनेक तत्व मिश्रित है।
गढ़वाली लोकगीतों के अनेक संग्रह प्रकाशित है।
बिहारी हिंदी की बोलियाँ
भोजपुरी, मगही, मैथिली
मगही
'मगही' शब्द 'मागधी' का विकसित रूप है।
मगही या मागधी का अर्थ है- 'मगध की भाषा'।
बिहार राज्य के पटना, गया, मुंगेर, जहानाबाद, नालंदा, नवादा, जमुई, शेखपुरा, औरंगाबाद, लक्खीसराय, भागलपुर तथा झारखण्ड राज्य के पलामू, हजारीबाग तथा उसके निकटर्ती भूभाग में बोली जाती है।
मगही का परिनिष्ठित रूप 'गया' जिले में व्यवहृत होता है।
मैथिली
मिथिला की बोली 'मैथिली' है।
इसका उद्भव मागधी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ है।
मैथिली का क्षेत्र बिहार के उत्तरी भाग में पूर्वी चम्पारन, मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, दरभंगा, पूर्णिया तथा उत्तरी संथाल परगना है।
इसके अतिरिक्त यह माल्दह, दिनाजपुर, भागलपुर, तिरहुत की सीमा के पास नेपाल की तराई में भी बोली जाती है।
भोजपुरी
बिहारी उपभाषा वर्ग की भोजपुरी बोली का विकास मगधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से हुआ है।
बिहार के शाहबाद जिले के भोजपुर नामक कस्बे के आधर पर इससे इसे भोजपुरी कहा जाता है।
इसे पूरबी अथवा भोजपुरिया भी कहते हैं।
बिहार के शाहबाद, सारण चंपारण, जसपुर, पलामू, मुजफ्फरपुर का कुछ भाग, उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर मिर्जापुर, गोरखपुर, आजमगढ़ आदि जिलों में बोली जाती है।
भोजपुरी की चार उपबोलिया हैं। उत्तरी भोजपुरी (था) भोजपुरी, दक्षिणी भोजपुरी, परिनिष्ठित रूप, पश्चिमी भोजपुरी, नगपुरिया।
भोजपुरी की मुख्य लिपि नागरी है पर कैथी का भी यदा-कदा प्रयोग होता है।
भोजपुरी का लोक साहित्य अवधी के बाद सबसे ज्यादा समृद्ध माना जाता है।
भिखारी ठाकुर, गोरखनाथ चौबे, रामविचार पांडे चंचरीक, राहुल सांकृत्यायन, संजीव आदि रचनाकार हुए हैं।
दक्खिनी हिन्दी की बोलियाँ
दक्खिनी का मूल आधार दिल्ली के आसपास की 14वीं-15वीं सदी की खड़ी बोली है।
दक्षिण में प्रयुक्त होने के कारण इसे 'दक्खिनी' बोली कहा जाता है।
दक्खिनी में कुछ तत्व पंजाबी, हरियाणी, ब्रज तथा अवधी के भी हैं।
दक्खिनी का मुख्य क्षेत्र बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर तथा गौणतः बरार, मुम्बई तथा मध्य प्रदेश है।
बाद में उर्दू का भी प्रभाव पड़ा।
साथ ही तमिल, तेलुगू तथा कन्नड़ का भी प्रभाव लक्षित होता है।
'दक्खिनी' की मुख्य उपबोलियाँ- गुलबर्गी, बीदरी, बीजपुरी और हैदराबादी है.
हिन्दी साहित्य : सामान्य परिचय
आधुनिक हिन्दी कविता का प्रारम्भिक रूप बिल्कुल भिन्न है।
काल खण्ड:
आदिकाल - 1050−1375 सं.
भक्तिकाल - 1375−1700 सं.
रीतिकाल - 1700−1900 सं.
आधुनिककाल- 1900 से अब तक
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा दिए गए आदिकाल को ही स्वीकार कर लिया गया।
आदिकाल राजनीतिक दृष्टि से उथल-पुथल वाला काल था।
बाहरी आक्रमण हो रहे थे।
महमूद गजनी और मुहम्मद गौरी जैसे आक्रान्ताओं से देश पीड़ित था ।
धार्मिक क्षेत्र में भी एकसूत्रता का अभाव था। वैष्णव, शैव, जैन, बौद्ध, शाक्त सभी में मतभेद थे।
समाज में अंधविश्वास और पाखण्डों का बोलबाला था।
सिद्धों और नाथों का साहित्य, जैन-साहित्य एवं रासो-साहित्य, लौकिक-साहित्य।
सिद्धों का जाति-पाति विरोध, रहस्यवाद तथा व्यवहारिक भाषा का प्रयोग सन्त कवियों का प्रेरक बना।
गोरखनाथ तथा अन्य नाथपंथियों की उलटबांसियाँ काव्यत्व की दृष्टि से उत्तम थी ।
बौद्धधर्म की अनेक शाखाएं बन गई थीं: बज्रयान।
जैन कवियों में लक्ष्मीधर ने 14वी शती में 'प्राकृतपैंगलम' के अनेक छंदो में विष्णु के अवतारों की चर्चा की है।
हेमचन्द्र ने 'प्राकृत व्याकरण' अपभ्रंश में रची।
यह समय विजयपाल रासो, बीसल देव रासो, परमाल रासो, पृथ्वीराज रासो आदि लिखे गए।
यह काव्य राज्याश्रित कवियों द्वारा रचित था।
इस युग के काव्य में वीर और शृंगार रस की प्रधानता है।
करूण, रौद्र एवं अदभुत रसों का भी इन काव्यों में वर्णन किया गया।
आदिकालीन काव्य में प्रबन्ध मुक्तकों, गीति काव्यों की रचना हुई।
अधिाकतर कवियों ने अपने-अपने आश्रयदाताओं का स्तुतिगान ही किया है।
इस काल में राष्ट्रीयता केवल अपने आश्रयदाताओं एवं उनके राज्य तक ही सीमित थी।
विद्यापति की कीर्तिपताका, कीर्तिलता एवं पदावली भी प्रमुख है।
अमीर खुसरो इस युग के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी हिन्दी रचनाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है।
1375 से 1700 संवत का काल हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है।
भक्ति आन्दोलन अखिल भारतीय था। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें जायसी, रहीम और रसखान की वाणी प्रवाहित हुई।
आचार्य शुक्ल ने इसे इस्लामी आक्रमण से पराजित जनता की असहाय और निराश मनोवृत्ति का परिणाम माना।
भक्ति की दो धाराएँ प्रवाहित हुई निर्गुण धारा और सगुण धारा ।
निर्गुण धारा से दो मत निकले सन्तकाव्य धारा और सूफी काव्यधारा।
सगुण धारा के भी दो मत हैं राम काव्यधारा और कृष्ण काव्यधारा।
मुक्तकों में रचनाएँ की है।
सगुण मार्गी काव्य धारा में दो भक्ति धाराएँ प्राप्त होती है: रामभक्ति धारा और कृष्ण भक्ति धारा ।
रामभक्ति काव्य में तुलसीदास सबसे बड़े कवि हैं।
कृष्ण भक्त कवियों में मुख्यतः सूरदास, नंददास, मीराबाई, रसखान, रहीम आदि कवियों ने कृष्ण लीलाओं का वर्णन किया ।
कृष्ण काव्य की रचना ब्रज भाषा में हुई है।
संवत 1700 से 1900 तक के समय को रीतिकाल कहा गया।
मुगल शासन का उत्कर्ष काल और पतन दोनों इस युग में दिखाई देते हैं।
रीतिकाल में तीन प्रकार का साहित्य मिलता है: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त ।
रीतिबद्ध कवियों में: केशव, सेनापति, देव, भूषण, मतिराम, पद्माकर गंग आदि हैं।
रीतिसिद्धि कवियों में: बिहारी।
रीतिमुक्त कवियों में: घनानंद, आलम, बोधा, ठाकुर आदि हैं।
कवित्त सवैये, इसके प्रधान छंद हैं।
घनान्द का काव्य दरबारी काव्य नहीं है। उन्होंने प्रेम की कविता लिखी हैं जो उनकी आत्मानुभूति है।
1900 से लेकर अब तक के काल को आधुनिक युग की संज्ञा मिली। आधुनिक युग को गद्य युग कहा जाता है।
आधुनिक काल के पहले चरण को भारतेंदु युग कहते हैं।
भारतेंदु और इस युग के अन्य साहित्यकारों पर अंग्रेजी की लुटेरी नीति का काफी प्रभाव पड़ा।
भारतेंदु ने आर्थिक विषमता, स्वाधीनता, नारी शिक्षा, धार्मिक पाखण्ड, हिन्दी, भाषा पर अपने विचार प्रकट किए।
भारतेन्दु ने 'हरिश्चन्द्र' पत्रिका की शुरुआत की।
स्त्री शिक्षा के लिए उन्होंने 'बोधिनी' नामक पत्रिका निकाली।
भारतेंदु हरिश्चन्द्र राष्ट्रीय विचारों वाले देशप्रेमी कवि थे। उनके साहित्य में साम्राज्यवाद के प्रति विद्रोह है।
भारतेंदु युगीन कवियों ने ब्रज और खड़ी बोली दोनों में रचनाएँ कीं पर ब्रज भाषा का प्रयोग अधिक किया।
प्रताप नारायण मिश्र ने टैक्स, अकाल, मंहगाई जैसे विषयों पर होली फाग और लावनी जैसी जनप्रचलित काव्य शैलियों का प्रयोग किया है।
दो सखुने और चना जोर गरम आदि।
द्विवेदी जी ने 1903 में 'सरस्वती' पत्रिका का सम्पादन संभाला।
उन्होंने खड़ी बोली को परिष्कृत परिमार्जित कर काव्य भाषा के रूप में प्रस्तुत किया।
इस युग में खण्डकाव्य, प्रबंध काव्य, रीतिकाव्य सभी काव्यरूपों में रचनाएँ हुईं।
श्रीधर पाठक और रामनरेश त्रिपाठी जैसे कवियों ने कल्पना प्रधान प्रबंध काव्य लिखे ।
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएं हिन्दी कविता को राष्ट्रीयता के रूप को प्रस्तुत करती है।
1920 से 1947 तक का काल छायावाद के नाम से जाना जाता है।
माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान ने राष्ट्रीय काव्य की रचना की।
प्रसाद, निराला पंत और महादेवी छायावाद के प्रमुख कवि हैं।
छायावाद में प्रकृति का विविधरूपी प्रयोग हुआ है। छायावादी कवियों ने प्रकृति में मानव जीवन का प्रतिबिंब ही देखा है। . छायावाद भावात्मक दृष्टिकोण है। है।
छायावादी कवियों ने ही छायावादी काव्य को छोड़ कर प्रगतिवादी काव्य रचना शुरू कर दी थी।
1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई।
नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल त्रिलोचन शिवमंगल सिंह सुमन गजानन माधव मुक्ति बोध आदि इस समय काव्य रचना में प्रवृत्त थे ।
1943 के आस-पास प्रयोगवादी काव्य अस्तित्व में आता है।
अज्ञेय द्वारा तारसप्तक प्रकाशित किया गया। इसमें सात कवि संकलित थे: मुक्ति बोध रामविलास शर्मा, नेमिचन्द्र जैन, गिरिजा कुमार माथुर, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे और अज्ञेय ।
सन् 1950 के बाद का काव्य जो रूप लेकर उभरा उसे नई कविता कहा गया।
1951 में दूसरा सप्तक और 1959 में तीसरा सप्तक प्रकाशित हुआ।
इस काव्यधारा में लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, विजय देव नारायण साही, विपिन अग्रवाल और श्रीराम वर्मा आदि हैं।
1960 के बाद कविता में अस्वीकृति का स्वर तीव्र हुआ।
वर्तमान दौर में राजेश जोशी, केदारनाथ सिंह, अरूण कमल, मंगलेश डबराल, उदयप्रकाश, वीरेन्द्र डंगवाल, ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, अशोक वाजपेई, केदारनाथ सिंह इत्यादि प्रमुख कवि थे।
इतिहास का लक्ष्य सदा अतीत की व्याख्या करते हुए विवेच्य वस्तु के विकास-क्रम को स्पष्ट करने का होता है जबकि आलोचना का लक्ष्य वस्तु के गुण-दोषों का अन्वेषण करते हुए उसका मूल्य निर्धारित करना होता है।
किसी भी साहित्य की विकास प्रक्रिया के अध्ययन के लिए उससे सम्बंधित ये तत्व:
सर्जन शक्ति
परम्परा
वातावरण
द्वन्द्व
सन्तुलन
हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन का सबसे पहला प्रयास फ्रेंच विद्वान 'गार्सा द तासी' का है।
शिवसिंह सैंगर का 'शिवसिंह सरोज' (सन् 1899 ई.)।
जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित 'द मार्डन वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान ' का प्रकाशन 1888 में। यह हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास माना जा सकता है।
मिश्रबन्धु द्वारा रचित 'मिश्रबन्धु विनोद' चार भागों में विभक्त है। इसका प्रथम तीन भाग 1913 ई. में प्रकाशित हुआ तथा चतुर्थ भाग 1934 ई. में प्रकाशित हुआ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित हिन्दी साहित्य का इतिहास 1929 में हुआ।
भक्तिकाल को चार भागों में बाँटकर शुद्ध दार्शनिक एवं धार्मिक आधार पर प्रतिष्ठित किया ।
डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'हिन्दी साहित्य की भूमिका', हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास', हिन्दी साहित्य का आदिकाल' लिखा ।
रामकुमार वर्मा ने 'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' (938 ई.) लिखा।
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के सम्पादन में 'हिन्दी साहित्य' की रचना की गई है।
गणपति चन्द्र गुप्ती: हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास
आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य को चार कालों में बांटा: आदिकाल, भक्तिकाल रीतिकाल, आधुनिक काल।
काल विभाजन साहित्यिक प्रवृत्तियों और रीति आदर्शों की समानता के आधार पर होना चाहिए।
युगों का नामकरण यथा संभव मूल साहित्य-चेतना को आधार मानकर साहित्यिक प्रवृति के अनुसार करना चाहिए।
वीरगाथा काल के लिए हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा सुझाया गया नाम ‘आदिकाल' उपयुक्त है।
काल विभाजन (डा. नगेन्द्र )
आदिकाल: सातवीं शती के मध्य से चौदहवीं शती के मध्य तक
भक्ति काल: चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती के मध्य तक
रीतिकाल: सत्रहवीं शती के मध्य से उन्नीसवीं शती के मध्य तक
आधुनिक काल: उन्नीसवीं शती के मध्य से अब तक
पुनर्जागरण काल (भारतेन्दु काल) 1857−1900 ई.
जागरण सुधार काल 1900−1918 ई.
छायावाद काल 1918−1938
छायावादोत्तर काल
प्रगति प्रयोग काल 1938−1953
नवलेखन काल 1953 ई. से अब तक
प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है।
भरतमुनि ने अपभ्रंश नाम न देकर लोकभाषा को 'देश भाषा' ही कहा है।
अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है। (वि. स. 650 से पहले)।
सिद्ध, बौद्ध धर्म के विकृत रूप वज्रयान संप्रदाय से थे। बिहार के नालंदा और विक्रमशिला नामक प्रसिद्ध विद्यापीठ इनके अड्डे थे।
सिद्धों में सबसे पुराने 'सरह' (सरोज व्रज) हैं।
वज्रयानियों की योग तंत्र साधना में मद्य तथा स्त्रियों का विशेषतः डोमिनी, रजकी आदि का अबाध सेवन एक आवश्यक अंग था ।
वज्रयान में आकर महासुखवाद का प्रवर्तन हुआ।
शून्य, विज्ञान और महासुख निर्वाण के तीन अवयव ठहराए गए।
नाथपंथ: गोरखनाथ ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया।
वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूर्वी भाग था, जबकि गोरहठ ने नाथपंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों - राजपूताने और पंजाब में किया
गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे।
शूद्र से 84 सिद्धों में मछुए, चमार, धोबी, डोम, कहार, लकड़हारे, दरजी तथा बहुत कहे जाने वाले लोग थे ।
कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकार 'साखी' और 'बानी' शब्द मिले, उसी प्रकार साखी और बानी के लिए बहुत कुछ सामग्री और सधुक्कड़ी भाष है भी।
आदिकाल और मध्यकाल की विशेषताएँ
इतिहास सदैव साक्ष्य की खोज करता है।
कर्नल टॉड द्वारा लिखा गया राजस्थान का इतिहास में चारण कवियों का वर्णन है।
मोतीलाल मेनारिया ने राजस्थान में हिन्दी के हस्त लिखित ग्रंथों की खोज की।
गार्सा द तासी का 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई- ए-ऐन्दुस्तानी'
शिवसिंह सेंगर का 'शिवसिंह सरोज' (1883)
डॉ. जार्ज ग्रियर्सन ने 'द मॉडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' (1888 में),